टीसीएस नैशिक यौन उत्पीड़न मामले में मुख्य आरोपी निधा खान ने कई हफ्तों तक पुलिस से बचते हुए शहर में फिरती रही। मामला तब तक गर्म होता गया जब तक पुलिस ने धुंधली तरकीब अपनाकर उसे हिरासत में नहीं ले ली। यह घटना न केवल न्यायपालिका के लिए चुनौती बन गई, बल्कि राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर भी व्यापक बहस छेड़ दी। पड़ताल के शुरुआती चरणों में निधा खान को कई सूचनाओं के बावजूद गिरफ्तार नहीं किया जा सका। वह विभिन्न ठिकानों पर घूमती रही, अक्सर अपने नाम पर बनाई गयी झूठी पहचान और मोबाइल नंबरों का प्रयोग करती रही। पुलिस ने कई बार प्रत्यक्ष जाँच और घर छानबीन की, परन्तु वह हर बार किसी न किसी बहाने से बच निकलती थी। इस दौरान निधा खान ने सोशल मीडिया पर निरंतर अपना समर्थन बना रखा और कई बार अपने पक्ष में कहानियां भी सबमिट कीं। अंततः, पुलिस ने एक नई रणनीति अपनाने का फैसला किया। उन्होंने निधा खान के करीबी दोस्तों और रिश्तेदारों के मोबाइल फोन से स्थानीय नेटवर्क पर एक विशेष ट्रेसिंग सॉफ़्टवेयर स्थापित किया। इस तकनीक की मदद से पुलिस ने उसके फोन के सिग्नल को लगातार ट्रैक किया और उसकी हर चाल-ढाल को रियल टाइम में मॉनीटर किया। जब निधा खान ने एक छोटे से उपनगर में अपने घर जाने का इरादा किया, तो पुलिस ने तुरंत एक विशेष टीम को तैनात कर उसे मोनिटरिंग स्टेशन के सामने ही रोक दिया। इस चतुर कदम के कारण निधा खान को अब भागने का कोई मौका नहीं मिला और वह पुलिस हिरासत में ले ली गई। निधा खान की इस गिरफ्तारी ने कई सवाल उठाए। न्यायिक प्रक्रिया में इस तरह के तकनीकी उपाय की वैधता पर चर्चा बढ़ी। कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि व्यक्तिगत गोपनीयता और अधिकारों के उल्लंघन के साथ ऐसी कार्यविधि अस्वीकार्य हो सकती है। वहीं, पुलिस का कहना है कि यह कदम केवल सार्वजनिक सुरक्षा और न्याय सुनिश्चित करने के लिए उठाया गया था। अंत में, निधा खान को 11 मई तक पुलिस हिरासत में रहने की अनुमति दी गई, जबकि उसके विरुद्ध आगे की जांच जारी है। इस मामले ने यह स्पष्ट कर दिया कि आधुनिक तकनीक और पारंपरिक जाँच विधियाँ मिलकर अपराधियों को पकड़ने में कितनी प्रभावी हो सकती हैं। साथ ही, यह भी याद दिलाता है कि न्याय की प्रक्रिया में सभी पक्षों को संतुलित तरीके से सुनना और उनके अधिकारों का सम्मान करना आवश्यक है।