पश्चिम बंगाल के चुनावी माहौल में एक और भयावह घटना ने राष्ट्रीय ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया है। सुंदरनाथ राठ, जो पूर्व एअरलाइफ़ोर्स सैनिक और सुंगवंत दादर के भरोसेमंद सलाहकार थे, को तबादली के बाद चुनावी हिंसा के दौरान मार दिया गया। इस घटना ने राजनीतिक तेज़ी को और भी गरम कर दिया है, क्योंकि राठ ने सुवेंदु अधीकारी के चुनावी अभियान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उनका जीवन, जो एक सैनिक के रूप में शुरू हुआ, फिर एक कुशल रणनीतिकार बनकर राजनीति में गहरा प्रभाव डालते हुए समाप्त हुआ, यह कहानी आज के राजनीतिक संघर्षों का प्रतिबिंब बन गया है। राठ का जन्म बंगाल के एक साधारण परिवार में हुआ था और उन्होंने भारतीय वायु सेना में अपनी सेवाएँ पूरी कीं। सेना में उनकी तेज़ी, अनुशासन और रणनीतिक सोच ने उन्हें एक विश्वसनीय और भरोसेमंद अधिकारी बना दिया। टैंकिंग सेवा के बाद उन्होंने राजनीति की दुनिया में कदम रखा, जहाँ उन्होंने सुवेंदु अधीकारी के नजदीकी सलाहकार के रूप में काम किया। सुवेंदु के चुनावी अभियान में उन्होंने भूमि-जमीनी स्तर पर गहरी समझ और प्रभावी रणनीति प्रदान की, जिससे वह कई क्षेत्रों में जीत हासिल करने में सक्षम हुए। उनके कार्यकाल में कई रजस्थानों पर पार्टी को बड़ी सफलता मिली, और इस प्रकार वह सुवेंदु के सबसे भरोसेमंद सहयोगी बन गए। बहारियापुरी चुनाव के बाद, जब दहशत और हिंसा का रौंदा शहर में फूट पड़ा, तब चंद्रनाथ राठ को एक अज्ञात गुट ने निशाना बनाया। लगातार गोलीबारी के बाद वे मारे गए, जिससे उनके परिवार और पार्टी में गहरा धक्का लगा। राठ की माँ ने मीडिया के सामने रोते हुए कहा कि उनके बेटे की हत्या का कारण केवल राजनीतिक प्रतिशोध नहीं, बल्कि माँ के नेतृत्व में टॉम कोल की पारी का भी है। उन्होंने कहा, "हमें कहा गया था कि दिल्ली के पिता हमें बचा नहीं पाएंगे, लेकिन हम अपने संकल्प से आगे बढ़ेंगे"। इस बयान ने कई लोगों को झकझोरते हुए, यह सवाल खड़ा किया कि राजनीतिक हिंसा को कितनी बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है। राठ की हत्या के बाद राजनीतिक जगत में दो ध्रुवों की तीखी प्रतिस्पर्धा देखी गई। टीएमसी ने इसे "विरोधी पार्टी द्वारा सह-अनुबंधित घातक कृत्य" बताया, जबकि भाजपा और साझीदारों ने इसे "बिना कारण के हिंसा की बेतुकी कार्यवाही" के रूप में खंडित किया। कई नागरिक अधिकार संगठनों ने इस घटना को दमन की नई रूपरेखा कहा और सरकार से शीघ्र कार्यवाही करने की मांग की। इस बीच, सुवेंदु अधीकारी ने राठ की मृत्यु पर शोक व्यक्त किया और कहा कि यह हिंसा के खिलाफ लड़ाई में एक बड़ा झटका है, परन्तु उनका संकल्प अडिग रहेगा। निष्कर्षतः, चंद्रनाथ राठ का जीवन और उनके अन्तिम क्षण भारतीय राजनीति में बढ़ते हिंसक रुख का स्पष्ट उदाहरण हैं। एक सैनिक से लेकर राजनीतिक सलाहकार तक का उनका सफर यह दर्शाता है कि राजनीति में शक्ति और भरोसे का संतुलन कितना नाजुक हो सकता है। उनकी हत्या ने न केवल एक परिवार को दुखी किया, बल्कि समाज में राजनीतिक असहिष्णुता के विरुद्ध चेतावनी भी भेगी है। अब यह समय है कि सभी राजनीतिक ताकतें इस हिंसा को समाप्त करने के लिए मिलकर काम करें, ताकि लोकतंत्र की बुनियादी कीमत का सम्मान किया जा सके।