नई दिल्ली- संसद के युवा सांसद राघव चadha ने इस हफ्ते राष्ट्रपति सरमा सर्वप और्देसराय मुरमु से मुलाक़ात की और एएपी से छंटकर भाजपा में शामिल हुए कई सांसदों को झेले जा रहे "हैरासमेंट" का खुलासा किया। यह मुलाक़ात दिल्ली के राष्ट्रपति कार्यालय में हुई, जहाँ चadha ने पार्टी से खुद को अलग करने के बाद मिलने वाली लगातार दबाव, धमकी और सामाजिक बहिष्कार की पेशकशों को संसद में अभिव्यक्त किया। राघव चadha ने कहा कि उन्होंने कई बार एएपी में उपस्थितियों के कारण अपने निर्वाचन क्षेत्र की समस्याओं पर काम करने का अवसर पाया, परन्तु जब उन्होंने भाजपा में बदलने का निर्णय लिया तो मिश्रित पहलुओं का सामना करना पड़ा। उन्होंने विशेष रूप से बताया कि कई राजनैतिक दल अपने सदस्य को छोड़ने के बाद उसे "शत्रु" के रूप में देखना शुरू कर देते हैं, और इस प्रक्रिया में वह सदस्य सार्वजनिक, मीडिया और सामाजिक मंचों पर लगातार निशाना बन जाता है। चadha ने यह भी कहा कि उन्होंने प्रशासनिक और राजनीतिक दबाव के तहत कई वैधानिक सवालों का जवाब देना पड़ा, जैसे कि उनका लाचारी से जुड़े मामलों का सामना करना, उनके परिवार को त्रासदीपूर्ण स्थितियों में डालना, तथा सोशल मीडिया पर निंदनीय अभियोजन। राष्ट्रपति मुरमु ने इस विषय पर गंभीरता से सुनकर कहा कि संविधान के तहत किसी भी सांसद को अपनी विचारधारा बदलने का अधिकार है और उन्हें किसी भी तरह का उत्पीड़न सहन नहीं करना चाहिए। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि "राष्ट्रपति कार्यालय" ऐसे मामलों में शीघ्र कार्रवाई करेगा और यदि कोई भी संसद सदस्य अपने अधिकारों के उल्लंघन का शिकार होता है तो उसकी सुरक्षा के लिए सर्वोच्च स्तर पर हस्तक्षेप किया जाएगा। इसी दौरान पंजाब के मुख्यमंत्री בענराज सिंग मान ने भी राष्ट्रपति मुरमु से मुलाक़ात करके एएपी से भाजपा में शिफ्ट हुए छह राज्यसभा सदस्यांच्या सदस्यता रद्द करने की मांग रखी। मान ने बताया कि इन सदस्यों का "वेंडेटा राजनीति" के तहत उन्हें लगातार गाली-गलौज और मौखिक दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ रहा है। एएपी ने भी इस समस्या को उजागर करने के लिए समय-समय पर राष्ट्रपति को लिखित अनुरोध भेजा है, जिससे इस दावे को आधिकारिक तौर पर जांचा जाए। निष्कर्ष स्वरूप, राघव चadha की इस मुलाक़ात ने भारतीय राजनीति में दलीय घातकता की नई परत को उजागर किया है। सांसदों को अपनी विचारधारा बदलने के अधिकार का प्रयोग करते समय जो डर और बाधाएं सहनी पड़ती हैं, वह लोकतांत्रिक प्रक्रिया के साक्ष्य हैं। राष्ट्रपति मुरमु की प्रतिक्रिया में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि इस प्रकार के "हैरासमेंट" को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा और सम्बंधित पक्षों को क़ानूनी कार्रवाई का सामना करना पड़ेगा। यह मामला न केवल राघव चadha के लिये बल्कि सभी निर्वाचित प्रतिनिधियों के लिये एक चेतावनी के रूप में काम करेगा, जिससे भारतीय लोकतंत्र के मजबूती और पारदर्शिता के सिद्धांतों को पुनर्स्थापित किया जा सके।