असम चुनाव 2026 की हलचल ने पूरे देश में चर्चा का माहौल बना दिया है। इस बार भी राज्य में सबसे प्रमुख नेता के रूप में वर्तमान मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सार्मा का नाम स्पष्ट रूप से सामने है। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के तहत वह दूसरे कार्यकाल के लिए अपनी आँखा ठोके हुए हैं, और इस आशा से उनका अभियान तेज़ी से चल रहा है। दल के अंदर और बाहर दोनों ही स्तरों पर यह स्पष्ट है कि सरमा को फिर से मनशा की सत्ता में देखना ही पक्षपात का हिस्सा नहीं, बल्कि भाग्यशाली राजनैतिक तालमेल का परिणाम है। भाजपा ने अपने चुनावी गठजोड़ को सुदृढ़ किया है, और सरमा ने पहले से ही अपने विकास कार्यों को सामने रखकर मतदाताओं को आकर्षित किया है। पूर्वी भारत में उन्होंने सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा और उद्योग के क्षेत्रों में कई महत्वपूर्ण परियोजनाएँ पूरी की हैं, जिसके कारण उनका समर्थन ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में बढ़ा है। इस क्रम में वह अपने विरोधियों, विशेषकर कांग्रेस पार्टी, को भी चुनौती देने के लिए कई प्रमुख मुद्दों को उठाते हुए अपनी सत्ता के प्रदर्शन को सिद्ध करने का प्रयास कर रहे हैं। कई मतदाता संगठनों के सर्वेक्षणों में यह देखा गया है कि सरमा के कार्यकाल में आर्थिक विकास की गति ने जनता को आशावादी बना दिया है, जिससे दूसरी मियाद की उम्मीदें और भी प्रबल हो गई हैं। दूसरी ओर, कांग्रेस ने भी अपनी स्थिति को मजबूत करने के लिये कई रणनीतियों को अपनाया है। उनका दावा है कि पिछले कुछ वर्षों में राज्य में सामाजिक न्याय और शिक्षा के क्षेत्र में कमी आई है, और वे इस असंतोष को बढ़ावा देकर भाजपा को चुनौती देना चाहते हैं। कई प्रमुख नेताओं ने कहा है कि यदि भाजपा को भीत्री जीत हासिल नहीं होती, तो यह असम के विकास के लिये हानिकारक हो सकता है। फिर भी, निर्वाचन परिणामों की पूर्वसूचनाएँ दिखा रही हैं कि भाजपा का समर्थन अभी भी बहुत मजबूत है, विशेषकर युवा वर्ग में। अंत में यह कहा जा सकता है कि हिमंत बिस्वा सार्मा के दो साल की मियाद के लिये संघर्ष की लहर अब बहुत स्पष्ट हो चुकी है। उनके विकास मॉडल और जनता के साथ उनका बंधन, उन्हें इस बार एक बार फिर सत्ता की बंधी में लाने में मदद कर सकता है। यदि भाजपा सफल होती है, तो यह राज्य में एक नई दिशा का संकेत होगा, जबकि कांग्रेस का संभावित उछाल भी असम की राजनीति में नई ऊर्जा ला सकता है। वाचिक रूप से कहा जाए तो, आगामी परिणाम न केवल राज्य की राजनीतिक दिशा तय करेंगे, बल्कि असम के भविष्य के विकास पर भी गहरा असर डालेंगे।