कैलाश मानसरोवर के पवित्र यात्रियों के लिए लिपुलेख द्वार हमेशा से ही एक प्रमुख मार्ग रहा है, परन्तु हाल ही में नेपाल सरकार ने इस मार्ग को लेकर भारत और चीन दोनों के साथ असहज स्थिति पैदा कर दी है। नेपाळ के विदेश मंत्रालय ने तेज़ी से जारी एक बयान में स्पष्ट कर दिया कि लिपुलेख पास से कैलाश‑मनसरोवर यात्रा का आयोजन करने पर वे दृढ़ विरोध करेंगे। यह कदम दोनों देशों के बीच चल रहे सीमा‑संबंधी विवाद को और भड़का रहा है, क्योंकि नेपाल का दावा है कि लिपुलेख भारत‑चीन के बीच साझा सीमा का हिस्सा नहीं है, बल्कि यह नेपाल के संप्रभु क्षेत्र में आता है। विदेश मंत्रालय ने इस मुद्दे पर भारत के विदेश मंत्रालय को औपचारिक नोट भी भेजा, जिसमें उन्होंने लिपुलेख को नेपाल के आधिकारिक मानचित्र में शामिल करने की पुकार की। भारी दूरी पर स्थित कैलाश पर्वत का धार्मिक महत्व हिन्दुओं, बौद्धों और जाइन धर्म के अनुयायियों के लिए अत्यधिक है, और हर साल हजारों तीर्थयात्री इस स्थल को देखने के लिए विभिन्न मार्गों से यात्रा करते हैं। इस वर्ष भारत ने लिपुलेख द्वार से 2026 की कैलाश‑मनसरोवर यात्रा की तैयारी कर ली थी, जिसके तहत विशेष टूर पैकेज, सुरक्षा व्यवस्था और भारत‑चीन के बीच संचार सुविधाओं को सुदृढ़ किया जा रहा था। परन्तु नेपाल की तत्कालीन सरकार ने इस योजना को लेकर सार्वजनिक रूप से विरोध किया, कहा कि यह उनके राष्ट्रीय स्वाधीनता और क्षेत्रीय अधिकारों पर चोट पहुँचाता है। नेपाल के प्रधानमंत्री के आधिकारिक बयान में यह भी कहा गया कि लिपुलेख को राष्ट्रीय सीमाओं का त्रुटिपूर्ण प्रतिनिधित्व माना जाता है, और इस मार्ग का उपयोग कर तीर्थयात्रा का प्रारंभिक बिंदु बनाना उनके संप्रभु अधिकारों के उल्लंघन के रूप में देखा जाएगा। भारत के विदेश मंत्रालय ने तुरंत इस नोटिस का उत्तर दिया, जिसमें उन्होंने नेपाल के साथ द्विपक्षीय संवाद के माध्यम से इस विवाद का समाधान खोजने की इच्छा व्यक्त की। मंत्रालय ने यह भी कहा कि लिपुलेख द्वार की स्थिति एक ऑरियन्टल विद्यमान समझौते पर आधारित है, और भारत ने अपने सीमावर्ती क्षेत्रों में किसी भी तरह का परिवर्तन नहीं किया है। साथ ही, उन्होंने इस बात का आश्वासन दिया कि कैलाश‑मनसरोवर यात्रा के सभी मार्गों को सुरक्षित और सम्मानजनक ढंग से संचालित किया जाएगा, बिना किसी राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय सीमा विवाद को बढ़ावा दिए। इस बीच, नेपाल ने फिर से अपने मानचित्र में लिपुलेख को स्पष्ट रूप से दर्शाया और भविष्य में इस मार्ग के उपयोग को रोकने के लिए अंतरराष्ट्रीय मंचों पर आवाज़ उठाने का संकल्प किया। इस विवाद के कारण कई तीर्थयात्रियों के लिए यात्रा की योजना में बदलाव करना पड़ सकता है, क्योंकि लिपुलेख के अलावा अब अन्य वैकल्पिक मार्ग जैसे जलंधर, गम्भीरपुर आदि पर ध्यान केंद्रित किया जा रहा है। यात्रा एजेंसियों ने बताया कि लिपुलेख के बजाय सतलीज या धरोढ़ी मार्गों को प्राथमिकता दी जा रही है, जिससे यात्रा का खर्च और समय दोनों में बदलाव आएगा। साथ ही, सुरक्षा बलों ने तनाव के माहौल को देखते हुए भी सीमा‑पार यात्रियों के लिये विशेष सुरक्षा प्रोटोकॉल तैयार किए हैं, ताकि किसी भी प्रकार के प्रकोप को रोका जा सके। निष्कर्षतः, लिपुलेख को लेकर नेपाल‑भारत‑चीन के बीच तनाव ने कैलाश‑मनसरोवर यात्रा को एक संवेदनशील कूटनीतिक मुद्दा बना दिया है। जबकि भारत अपने धार्मिक यात्रियों की सुविधा के लिए तैयारी कर रहा है, नेपाल अपनी राष्ट्रीय संप्रभुता को सुरक्षित रखने के लिए दृढ़ रुख अपनाया है। इस स्थिति में दोनों देशों के बीच संवाद एवं समझौता ही इस विवाद को स्थायी समाधान की ओर ले जा सकता है, जिससे भविष्य में यात्रियों को बिना किसी बाधा के पवित्र स्थल की यात्रा करने का अवसर मिल सके।