आज 29 अक्टूबर 2026 को देशभर के साथ-साथ राजस्थान में भी करवा चौथ का पावन पर्व अपार श्रद्धा, पारंपरिक उल्लास और उत्साह के साथ मनाया जा रहा है। राज्यभर में सुहागिन महिलाओं ने अपने पति की लंबी उम्र, बेहतर स्वास्थ्य और अखंड सौभाग्य की कामना के लिए पूरे दिन का कठोर निर्जला व्रत रखा है। घरों में सुबह से ही उत्सव जैसा माहौल है और शाम को होने वाली पूजा-अर्चना की तैयारियों को अंतिम रूप दे दिया गया है।
भारतीय संस्कृति और प्राचीन परंपराओं में गहराई से रचे-बसे करवा चौथ का पर्व पति-पत्नी के बीच अटूट प्रेम, समर्पण और पवित्र रिश्ते का प्रतीक है। पीढ़ियों से चली आ रही इस परंपरा के तहत महिलाएं सोलह शृंगार कर सामूहिक रूप से कथा सुनती हैं और अखंड सौभाग्य की प्रार्थना करती हैं। यह पर्व न केवल पारिवारिक मूल्यों को मजबूत करता है, बल्कि सामाजिक सौहार्द और आपसी भाईचारे का भी एक सुंदर संदेश देता है।
दिन ढलने के साथ ही महिलाओं और उनके परिवारों में चांद निकलने के संभावित समय को लेकर उत्सुकता और प्रतीक्षा चरम पर पहुंच जाती है। भौगोलिक स्थिति और भौगोलिक दूरियों के कारण राजस्थान के विभिन्न जिलों में चंद्र दर्शन के समय में आंशिक अंतर रहता है, जिसे लेकर प्रशासनिक और ज्योतिषीय आकलन भी सामने आ चुके हैं। जयपुर, जोधपुर, उदयपुर, कोटा, अजमेर और जैसलमेर जैसे प्रमुख जिलों में महिलाओं की नजरें आसमान पर टिकी हुई हैं।
पारंपरिक आयोजनों के दौरान बुजुर्ग महिलाओं और परिवार के वरिष्ठ सदस्यों द्वारा व्रत की कथा सुनाई जाती है, जिससे नई पीढ़ी को संस्कृति का ज्ञान मिलता है। रानी वीरवती की पौराणिक कथा के माध्यम से व्रत के अनुशासन और उसकी महिमा का वर्णन किया जाता है। महिलाएं सामूहिक रूप से पूजा की थाली सजाकर चंद्रमा के उदय होने की प्रतीक्षा करती हैं और एक-दूसरे को पर्व की शुभकामनाएं देती हैं।
इस पावन पर्व का क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था और स्थानीय व्यापार पर भी गहरा सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। बाजारों में पारंपरिक वस्त्रों, चूड़ियों, शृंगार सामग्री, करवा और पूजन सामग्री की दुकानों पर भारी भीड़ देखी जा रही है। स्थानीय व्यापारियों और कारीगरों के लिए यह त्योहारी सीजन आर्थिकदृष्टया बेहद लाभदायक साबित होता है, जिससे छोटे व्यापारियों को बेहतर कारोबार का अवसर मिलता है।
त्योहार के दौरान सुरक्षा और सुचारू व्यवस्था बनाए रखने के लिए स्थानीय प्रशासन और पुलिस विभाग द्वारा विशेष तैयारियां की गई हैं। प्रमुख बाजारों, मंदिरों और सार्वजनिक स्थलों पर यातायात नियंत्रण और सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए गए हैं ताकि महिलाओं को पूजन और आवाजाही में किसी प्रकार की असुविधा न हो। प्रशासनिक अमला पूरी तरह मुस्तैद रहकर शांतिपूर्ण और व्यवस्थित आयोजन सुनिश्चित कर रहा है।
संध्या बेला में चंद्र दर्शन और अर्घ्य अर्पित करने के साथ ही यह कठिन व्रत पूर्ण माना जाता है। पति के हाथों जल ग्रहण कर और उनका आशीर्वाद लेकर महिलाएं अपने व्रत का पारण करती हैं। 29 अक्टूबर 2026 का यह पावन दिन राजस्थान की सांस्कृतिक समृद्धि, पारिवारिक मूल्यों और परंपराओं के जीवंत स्वरूप को एक बार फिर रेखांकित करता है।