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राजस्थान निकाय चुनावों के बीच अशोक गहलोत और सचिन पायलट में ठनी, कांग्रेस में फिर कलह

राजस्थान निकाय चुनावों के ठीक बाद कांग्रेस पार्टी के भीतर अंदरूनी कलह एक बार फिर सतह पर आ गई है। यह राजनीतिक गतिरोध तब शुरू हुआ जब पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा का नाम लिए बिना चुनावी रणनीति पर सवाल खड़े किए।

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Kotputli News प्रकाशित: 22 Sep 2026, 05:37 PM
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राजस्थान निकाय चुनावों के बीच अशोक गहलोत और सचिन पायलट में ठनी, कांग्रेस में फिर कलह
राजस्थान निकाय चुनावों के बीच अशोक गहलोत और सचिन पायलट में ठनी, कांग्रेस में फिर कलह फोटो आभार: News18 Rajasthan State Wire
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राजस्थान के राजनीतिक गलियारों में हालिया निकाय चुनावों के संपन्न होने के ठीक बाद कांग्रेस पार्टी के भीतर अंदरूनी कलह एक बार फिर खुलकर सामने आ गई है। भारतीय जनता पार्टी के मुकाबले महज 1 फीसदी से भी कम मतों के अंतर से पिछड़ने के बाद पार्टी के भीतर रणनीतिक विफलताओं को लेकर मंथन शुरू हो गया है। यह मामूली हार कांग्रेस के लिए एकजुट होने का अवसर बनने के बजाय पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के बीच पुरानी अंतर्कलह को पुनर्जीवित करने का माध्यम बन गई है।

इस नए विवाद की शुरुआत तब हुई जब पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने निकाय चुनावों में पार्टी की चुनावी रणनीति और कार्यप्रणाली पर अप्रत्यक्ष रूप से सवाल खड़े किए। गहलोत ने अपनी पार्टी के मंच से प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा का नाम लिए बिना उनकी कार्यशैली और चुनावी प्रबंधन पर सवालिया निशान लगाए, जिससे पार्टी के भीतर खलबली मच गई। इन बयानों के बाद राजनीतिक हलकों में चर्चाओं का बाजार गर्म हो गया और पार्टी के भीतर मतभेद एक बार फिर उजागर हो गए।

इस पूरे घटनाक्रम में मतों के आंकड़ों का गणित सबसे बड़ा केंद्र बिंदु बन गया है, जहां कांग्रेस पार्टी भाजपा से केवल 1 फीसदी वोटों से पिछड़ गई। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह बेहद कम अंतर इस बात का प्रमाण है कि यदि चुनावी मैदान में रणनीतिक समन्वय बेहतर होता, तो परिणाम कांग्रेस के पक्ष में आ सकते थे। हालांकि, इस हार की जिम्मेदारी तय करने के बजाय दिग्गज नेताओं के बीच बयानों के तीर चलने लगे हैं, जिससे जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं में असमंजस की स्थिति पैदा हो गई है।

इस गरमागरमी के बीच वरिष्ठ नेता सचिन पायलट तुरंत मैदान में कूद पड़े और उन्होंने प्रदेश नेतृत्व का पुरजोर बचाव किया। सचिन पायलट के इस हस्तक्षेप ने यह स्पष्ट कर दिया कि पार्टी के भीतर गुटबाजी एक बार फिर चरम पर है, जहां एक तरफ अशोक गहलोत व्यवस्था पर सवाल उठा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ पायलट प्रदेश अध्यक्ष के समर्थन में खड़े नजर आ रहे हैं। इस तरह की बयानबाजी से पार्टी की छवि पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है और कार्यकर्ताओं का मनोबल भी प्रभावित हो रहा है।

इस उच्च स्तरीय राजनीतिक कलह का असर कोटपूतली-बहरोड़ सहित प्रदेश के विभिन्न जिलों में भी साफ तौर पर महसूस किया जा रहा है। स्थानीय स्तर पर कांग्रेस कार्यकर्ता और पदाधिकारी यह तय नहीं कर पा रहे हैं कि वे किस गुट के साथ खुद को जोड़ें, क्योंकि शीर्ष स्तर के नेताओं के बीच जारी जुबानी जंग का असर नीचे की इकाइयों तक पहुंच रहा है। जमीनी स्तर के कार्यकर्ताओं का कहना है कि इस प्रकार की आपसी फूट से स्थानीय निकाय और भविष्य के चुनावों में पार्टी की तैयारियों को तगड़ा झटका लग सकता है।

प्रशासनिक और राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि जब तक कांग्रेस का केंद्रीय नेतृत्व इस मामले में हस्तक्षेप करके दोनों पक्षों के बीच सुलह नहीं कराता, तब तक राज्य में पार्टी की स्थिति मजबूत नहीं हो सकती। पार्टी के भीतर समन्वय की कमी और नेतृत्व को लेकर चल रही खींचतान मुख्य विपक्षी दल के रूप में कांग्रेस की भूमिका को कमजोर कर रही है। जनता के बीच भी इस बात को लेकर नकारात्मक संदेश जा रहा है कि पार्टी अपने आंतरिक मामलों को सुलझाने में असमर्थ है।

आगामी समय और भविष्य की राजनीतिक गतिविधियों को देखते हुए यह आवश्यक हो गया है कि अशोक गहलोत, सचिन पायलट और गोविंद सिंह डोटासरा आपसी मतभेदों को भुलाकर संवाद का मार्ग अपनाएं। जनता और पार्टी कार्यकर्ताओं की उम्मीदें इस बात पर टिकी हैं कि क्या कांग्रेस आलाकमान इस बढ़ते विवाद पर अंकुश लगा पाएगा या फिर यह कलह पार्टी को और अधिक नुकसान पहुंचाएगी। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि पार्टी नेतृत्व इस आंतरिक संकट से निपटने के लिए क्या ठोस कदम उठाता है।

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