जैसे ही ईरान और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच परमाणु मुद्दे को सुलझाने की कोशिशें जलवायु में आईं, पाकिस्तान का मध्यस्थता करने का प्रस्ताव एक बार फिर सवालों के घेरे में आ गया। ईरानी संसद के एक प्रमुख सांसद, जो परमाणु समझौते के नज़रिए से गहरी जानकारी रखते हैं, ने खुलेआम कहा कि पाकिस्तान इस वार्ता में भरोसेमंद मध्यस्थ नहीं बन सकता। उनका यह बयान कई अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों में हवाले के साथ सामने आया, जिससे दोनों देशों के बीच वार्ता प्रक्रिया में और जटिलता जोड़ दी गई है। सांसद ने कहा कि पाकिस्तान का राजनयिक ढाँचा और उसकी अंतरराष्ट्रीय स्थिति दोनों ही इस बात को दर्शाते हैं कि वह ईरान-अमेरिका के संवेदनशील मुद्दे में प्रभावी मध्यस्थता नहीं कर सकता। उनका मुख्य कारण यह था कि पाकिस्तान अपने अंदरूनी राजनीतिक अस्थिरता, सुरक्षा की चुनौतियों और विभिन्न क्षेत्रीय दावों के बीच उलझा हुआ है। इसके अलावा, इस्लामिक देशों के बीच पाकिस्तान की भूमिका अक्सर असंतुलित रह गई है, जिससे वह किसी भी बड़ा समझौता करवाने वाले के रूप में भरोसे की नींव नहीं बना पाता। अन्य समाचार स्रोतों ने भी एक समान तस्वीर पेश की है। "द टाइम्स ऑफ इंडिया" के अनुसार, ईरान ने खुद को इस वार्ता में एक "रणनीतिक गलती" मानते हुए कहा कि पाकिस्तान पर भरोसा करने से वह अपने राष्ट्रीय हितों को नुकसान पहुँचा सकता है। इसी के साथ "फ़र्स्टपोस्ट" ने इशारा किया कि इस लहर में पाकिस्तान की विश्वसनीयता धीरे-धीरे घट रही है, खासकर जब वह अमेरिका और चीन दोनों से सम्बन्ध स्थापित करने की कोशिश कर रहा है। इससे उसकी मध्यस्थ की छवि धुंधली पड़ रही है। दूसरी ओर, पाकिस्तान का स्वयं का तंत्र इस बात की ओर संकेत करता है कि वह अंतरराष्ट्रीय मंच पर भूमिका ढूंढ रहा है। लेकिन जब तक वह अपने घरेलू मुद्दों, जैसे सुरक्षा, आर्थिक मंदी और राजनयिक नीतियों के हिसाब से स्थिरता नहीं लाता, तब तक बाहरी पक्षों को वह भरोसेमंद मध्यस्थ नहीं माना जाएगा। इसलिये, ईरान-अमेरिका के बीच परमाणु समझौते को आगे बढ़ाने के लिए अब संभवतः कोई नया मध्यस्थ ढूँढ़ना पड़ेगा, या फिर दोनों पक्ष सीधे संवाद करने की राह अपनाएंगे। निष्कर्षतः, पाकिस्तान का अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता की भूमिका अब सवालों के घेरे में है। ईरानी सांसद के इस स्पष्ट बयान ने यह स्पष्ट कर दिया कि भविष्य में संभावित समझौते के लिए पाकिस्तान की भूमिका सीमित रह सकती है। यह विकास न केवल ईरान-अमेरिका के संबंधों को प्रभावित करेगा, बल्कि क्षेत्रीय संतुलन और शांति प्रक्रिया में भी नई चुनौतियां लाएगा। इस परिदृश्य में अब अंतरराष्ट्रीय समुदाय को यह देखना होगा कि कौन सी नई कूटनीतिक रणनीति अपनाई जाएगी और किस देश को भरोसेमंद मध्यस्थ माना जाएगा।