जून 2024 में इटली के बर्गामो में आयोजित जी‑7 शिखर सम्मेलन में एक साधारण फोटो खिंचवाने का अनुरोध बड़ी राजनीतिक उलझन का कारण बन गया। अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन के साथी, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने दोहराया कि इटली की प्रधानमंत्री गैर ट्रेसा मेलोनी ने कई बार उन्हें साथ में एक फोटो लेने की विनती की, जबकि मेलोनी ने इस बात को नकारते हुए कहा कि उन्होंने कभी भी ट्रम्प को ऐसा नहीं कहा। इस बेमेल ने दोनों देशों के बीच टेंशन को बढ़ा दिया और अंतरराष्ट्रीय मीडिया में चर्चा का विषय बन गया। संभावित मित्रता की बातों के बीच शुरू हुई यह तक़दीर, जब ट्रम्प ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में बताया कि मेलोनी ने "बार-बार" उनसे मिलकर फोटो खिंचवाने का आग्रह किया। उन्होंने कहा, "वह फिर से दोस्त बनना चाहती हैं, लेकिन वह लगातार फोटो के लिए कहती रहती हैं।" दूसरी ओर, मेलोनी ने इस बात को बड़े स्पष्ट शब्दों में खंडित किया। इटली के प्रमुख समाचार एजेंसियों के अनुसार, मेलोनी ने कभी भी ट्रम्प को फोटोग्राफ़ के लिए नहीं कहा और इस आरोप को "बिलकुल भी सत्य नहीं" कहा। उन्होंने कहा कि यह एक राजनीतिक चाल है, जिसका उद्देश्य ट्रम्प को नकारात्मक छवि देना है। इस विवाद ने कई अंतरराष्ट्रीय समाचार एजेंसियों का ध्यान आकर्षित किया। बीबीसी, द टाइम्स ऑफ़ इंडिया, द हिन्दु और एनडीटीवी ने विभिन्न पहलुओं को उजागर किया। कुछ रिपोर्टों ने बताया कि दोनो नेताओं के बीच पहले भी खराब संबंध रहे हैं, तथा यह फोटो का मामला केवल एक छोटे से वार्तालाप का हिस्सा नहीं, बल्कि दोनों देशों के आर्थिक और रणनीतिक हितों पर भी असर डाल सकता है। इटली की सरकार ने स्पष्ट किया कि मेलोनी ने कभी भी ट्रम्प को दबाव नहीं बनाया और यह मामला केवल व्यक्तिगत स्तर पर गलतफहमी है, न कि कोई आधिकारिक नीति। वास्तविकता यह है कि इस तरह के छोटे-छोटे व्यक्तिगत मुद्दे अक्सर बड़े राजनीतिक मंचों पर बढ़ा-चढ़ा कर पेश किए जाते हैं। जी‑7 जैसी महत्त्वपूर्ण मंच पर, जहाँ विश्व के प्रमुख आर्थिक और सुरक्षा मुद्दों पर चर्चा होती है, ऐसे विवाद से मुख्य एजेंडा से ध्यान हट सकता है। विश्लेषकों का मानना है कि इस विवाद का मुख्य उद्देश्य दोनों देशों के अंदरूनी राजनीतिक दबाव को बढ़ाना और जनता के बीच समर्थन का आधार मजबूत करना हो सकता है। निष्कर्षतः, ट्रम्प और मेलोनी के बीच फोटो विवाद ने जी‑7 शिखर सम्मेलन के सार को पीछे धकेल दिया है। जबकि दोनों पक्षों ने अपनी-अपनी कहानियाँ पेश की हैं, सच्चाई यह है कि अंतरराष्ट्रीय सहयोग और संवाद को इस प्रकार की द्विपक्षीय टकराव से बचाया जाना चाहिए। आगे चलकर यह देखना रोचक होगा कि क्या यह मुद्दा प्रमुख आर्थिक समझौतों या सुरक्षा सहयोग को प्रभावित करेगा, या फिर यह जल्दी समाप्त होकर सामान्य राजनयिक संबंधों में वापस लौट आएगा।