लंदन के प्रतिष्ठित बिंदुस्कूल में 3 जुलाई को आयोजित व्याख्यान में भारत के मुख्य न्यायाधीश सूरज प्रकाश केन्द्रीय न्यायालय (सीजेआई) सूर्यकांत ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के भविष्य और भारतीय न्याय प्रणाली में उसकी भूमिका पर प्रकाश डाला। इस कार्यक्रम को कई भारतीय विस्थापित, विद्वान और विदेश में रहने वाले पत्रकारों ने बड़ी संख्या में उपस्थिति दर्ज की। प्रारम्भ में न्यायाधीश ने एआई को केवल सैद्धांतिक प्रयोग नहीं बल्कि वास्तविक कार्यस्थल में प्रयुक्त तकनीक बताया, जिससे भारतीय न्यायिक प्रक्रिया में गति और सटीकता दोनों में वृद्धि होगी। परंतु प्रश्नावली सत्र में भारतीय पत्रकारों में से एक ने ‘भारत में असहमति (डिसेंट) को दबाने की प्रवृत्ति’ के विषय पर उठाया, जो तुरंत ही मंच पर एक तीव्र बहस का कारण बना। प्रश्न पूछते ही कई दर्शकों में गुस्सा छा गया। कुछ ने न्यायाधीश को यह आह्वान किया कि न्यायिक प्रणाली को स्वतंत्रता और विचारों की विविधता को संरक्षित करना चाहिए, न कि केवल सुरक्षा और व्यवस्था के नाम पर असहमति को दबाना चाहिए। अन्य वक्ताओं ने कहा कि यह प्रश्न गंभीर है क्योंकि हालिया घटनाएं—जैसे पत्रकारों पर उत्पीड़न, इंटरनेट पर सेंसरशिप और विभिन्न सभ्यताओं में विरोध प्रदर्शन पर प्रतिबंध—समाज में असहिष्णुता की लहर दिखाते हैं। इस पर न्यायाधीश सूर्यकांत ने शांत स्वर में उत्तर दिया कि न्यायपालिका का मूल सिद्धांत लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा करना है, पर वह यह भी स्पष्ट करना चाहते हैं कि न्यायिक प्रक्रिया को तथ्यों और कानून के आधार पर ही मूल्यांकन किया जाता है, न कि राजनीतिक दबाव से। उन्होंने कहा कि एआई का उपयोग केवल तथ्यात्मक विश्लेषण और निर्णय प्रक्रिया में सहायता के लिए ही किया जाएगा, जिससे भावनात्मक या वैचारिक पक्षपात को कम किया जा सके। एक और मोड़ तब आया जब लंदन के स्थानीय मीडिया में ‘कोक्रोच पार्टी’ नामक एक समूह ने इस टकराव को कैप्चर कर सोशल मीडिया पर कई वीडियो पोस्ट किए। इन वीडियो में दर्शकों की तीखी प्रतिक्रियाओं, न्यायाधीश के उत्तरों और दर्शकों के बीच के विवादास्पद संवाद को तेज़ गति से दिखाया गया। कोक्रोच पार्टी ने इस घटना को भारतीय लोकतंत्र में मौजूदा असहिष्णुता की ओर इशारा कर कहा कि यह घटना भारत के भीतर और बाहर दोनों जगह अभिव्यक्त स्वतंत्रता पर गहरी चिंता दर्शाती है। उनके अनुसार, इस प्रकार के प्रश्नों पर सार्वजनिक मंच पर खुले तौर पर चर्चा न होने से भारत की अंतर्राष्ट्रीय छवि को नुकसान पहुँच सकता है। समाप्ति में न्यायालय ने इस चर्चा को एक सीख के रूप में लिया। न्यायाधीश सूर्यकांत ने दर्शकों से आग्रह किया कि लोकतंत्र की शक्ति बहुलता में निहित है और असहमति को आवाज़ देना लोकतांत्रिक प्रक्रिया का अभिन्न हिस्सा है। उन्होंने यह भी कहा कि एआई जैसी नई तकनीकों को अपनाते समय हमें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि ये उपकरण स्वतंत्र न्याय के सिद्धांतों को सुदृढ़ करें, न कि उन्हें कमजोर करें। इस विवाद ने न केवल एआई के न्यायिक उपयोग पर बहस को फिर से ताजा किया, बल्कि भारत में असहिष्णुता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और न्याय प्रणाली की पारदर्शिता को लेकर चल रही व्यापक बहस को भी उजागर किया। अंत में यह घटना इस बात का प्रमाण बनी रही कि अंतर्राष्ट्रीय मंच पर भारत के लोकतांत्रिक मूल्यों की जांच और मूल्यांकन हमेशा सतत रहेगा, और ऐसे प्रश्नों का खुले तौर पर उत्तर देना ही लोकतंत्र को सुदृढ़ करने का मार्ग है।