संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की महाधिवेशन में भारत ने पाकिस्तान के खिलाफ कट्टरता भरे शब्दों में आरोप लगाते हुए उसके "दीर्घकालिक जनसंहार के रिकॉर्ड" को उजागर किया। यह बयान भारतीय प्रतिनिधि द्वारा आया, जब उन्होंने अफगानिस्तान के विस्थापित जनसंख्या की सुरक्षा की मांग की और कहा कि पाकिस्तान ने अपने ही लोगों पर बमबारी करके शांति प्रक्रिया को नष्ट किया है। इस अवसर पर भारत ने यह स्पष्ट किया कि पाकिस्तान ने वर्षों से विभिन्न जातियों, अल्पसंख्यकों और नागरिकों के खिलाफ हिंसा को समर्थन दिया है, जिससे अंतरराष्ट्रीय समुदाय को इस बात का एहसास होना चाहिए कि इस तरह के कृत्य को कभी भी बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। संयुक्त राष्ट्र में इस बात को स्फटिक करने के बाद, भारत के स्थायी प्रतिनिधि ने पुनः दोहराया कि पाकिस्तान ने कश्मीर, सिंध और अल्पसंख्यक क्षेत्रों में लोगों को मार गिराने, घरों को जलाने, विस्थापित करने जैसी कई कृतियों को अंजाम दिया है। उन्होंने यह भी कहा कि इस तरह की नीतियों के परिणामस्वरूप क्षेत्र में असुरक्षा की भावना गहरी हुई है और अंतरराष्ट्रीय कानून के उल्लंघन की सख्त निंदा आवश्यक है। विश्व समुदाय को मिलकर ऐसे कृत्यों को रोकने के लिए ठोस कदम उठाने चाहिए, नहीं तो क्षेत्रीय शांति और स्थिरता को गंभीर खतरा हो सकता है। अभी के वैश्विक राजनयिक परिदृश्य में इस प्रकार के बयान का महत्व अत्यधिक है। भारत ने कहा कि केवल आश्रम स्थापित करने, मानवीय सहायता प्रदान करने से ही नहीं, बल्कि सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए तुरन्त अंतरराष्ट्रीय हस्तक्षेप की आवश्यकता है। उन्होंने अफगानिस्तान में जारी संघर्ष के कारण नागरिकों की मौतों का उल्लेख करते हुए कहा कि पाकिस्तान ने खुद के नागरिकों के साथ ही किन देशों का समर्थन किया है, यह एक बड़ा प्रश्न है। यह स्पष्ट किया गया कि भारत का उद्देश्य शांति की स्थापना, मानवीय अधिकारों की रक्षा और जनसंहार के जोखिम को कम करना है। अंत में, भारत ने सभी सदस्य देशों को आग्रह किया कि वे पाकिस्तान के दुराचरण को परखें और इस प्रकार की हिंसा को समाप्त करने के लिए सख्त उपाय अपनाएँ। उन्होंने कहा कि यदि अंतरराष्ट्रीय समुदाय इस मुद्दे को गंभीरता से नहीं लेगा तो अफगानिस्तान तथा आसपास के क्षेत्रों में निरंतर पीड़ा और मानवीय संकट उत्पन्न होते रहेंगे। इस प्रकार, भारत का भारत- पाकिस्तान संबंधों में नई दिशा की घोषणा, विश्व स्तर पर न्याय, समानता और शांति के मूल सिद्धांतों की पुनः पुष्टि करता है।