भोपाल के एक हाई‑कोर्ट में पिछले सप्ताह दो प्रमुख फैसले सुनाए गये जो ट्विशा शर्मा के रहस्यमय निधन को लेकर जनता में उमड़ रहे कई सवालों को और भी जटिल बना रहे हैं। ट्विशा, जो एक उभरती फिल्मी अभिनेत्री थी, को अपने पति और सास के घर में दहेज के बहाने मारना चाहते हुए पाया गया था। हाल ही में उसके पारिवारिक वकीलों ने द्वितीय ऑटोप्सी की मांग की थी, परन्तु कोर्ट ने इस अनुरोध को ठुकरा दिया, यह तर्क देते हुए कि पहले ही कराए गए ऑटोप्सी रिपोर्ट में पर्याप्त सबूत मौजूद हैं। इस निर्णय के साथ ही मामले में न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि भविष्य में कोई अतिरिक्त जांच केवल तभी संभव होगी जब नई और अनदेखी साक्ष्य सामने आएँ। दूसरी ओर, मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री ने इस हत्या को एक सामाजिक बुराई के रूप में वर्णित करते हुए सीबीआई को इस मामले की गहन जांच करने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि दहेज हत्या के कुख्यात मामलों में यह मामला विशेष रूप से संवेदनशील है, क्योंकि इसमें एक युवा अभिनेत्री को सत्ता और धन के लालच ने घेर रखा था। मुख्यमंत्री की इस मांग के बाद, कई सामाजिक संगठनों ने भी इस पर तेज़ आवाज़ उठाई और दहेज प्रथा के निर्मूलन हेतु कड़े कदमों की माँग की। मामले की पृष्ठभूमि को देखते हुए यह स्पष्ट हो गया है कि ट्विशा की मृत्यु के पीछे कई जटिल सामाजिक और आर्थिक कारक जुड़े हुए हैं। कई रिपोर्टों के अनुसार, उसके पति ने दहेज की रकम नहीं मिलने पर ही उसे नुकसान पहुँचाने की साजिश रची थी। इसके अलावा, एक पुरानी रजिस्टर्ड शिकायत में यह भी संकेत मिला है कि उसकी सास ने भी इस अपराध में सक्रिय भूमिका निभाई थी। इस प्रकार, दहेज हत्या की फिरौती को लेकर कई पक्षों के बीच लम्बी लड़ाई अभी भी जारी है। अब सवाल यही है कि न्याय के प्रसंग में इस मामले को कैसे सुलझाया जाए। कोर्ट का द्वितीय ऑटोप्सी न देने का फैसला इस बात को दर्शाता है कि न्यायिक प्रक्रिया में तकनीकी सबूतों को पर्याप्त माना गया है, परन्तु सामाजिक न्याय की दृष्टि से यह निर्णय कई को असंतोषजनक लगा है। अभिव्यक्तियों की स्वतंत्रता और दहेज प्रथा के खिलाफ संघर्ष को देखते हुए, यह घटना एक चेतावनी बनी हुई है कि सामाजिक परिवर्तन तभी साकार हो सकता है जब न्यायपालिका, शासन और जनता मिलकर इस प्रकार की बुराइयों को समाप्त करने के लिए ठोस कदम उठाए।