भारत के सबसे वरिष्ठ न्यायाधीश ने एक सार्वजनिक कार्यक्रम में एक रोचक तुलना की, जिसमें उन्होंने सामाजिक वर्गों को एक छोटे कीट, कोकरोच, से मिलाकर कहा कि यह वर्ग जनता के लिये निरर्थक है। इस बयान ने राष्ट्रीय स्तर पर हँसी, व्यंग्य और विरोध दोनों को जन्म दिया। इंटरनेट पर झटपट वायरल हुए मीम, एंट्रीग्राम पर बड़ी संख्या में अनुयायियों के साथ स्थापित हुई नई राजनीतिक पार्टी, और तथाकथित राजनयिक मंच पर चर्चा, यह सब इस एक टिप्पणी के परिणामस्वरूप उभरे। विवाद के केंद्र में रहने वाली पार्टी ने स्वयं को "कोकरोच जनता पार्टी" के नाम से पुकारा, और सोशल मीडिया पर 60 लाख से अधिक फॉलोअर्स का आंकड़ा छापा। इस पार्टी के संस्थापक अभिजीत दीपके ने बताया कि उनका उद्देश्य मौजूदा राजनैतिक परिप्रेक्ष्य को तोड़ना और जनता के वास्तविक मुद्दों को मंच पर लाना है। उन्होंने कहा कि कोकरोच का प्रयोग सामाजिक वर्ग के दबावों के विरुद्ध एक प्रतीकात्मक हथियार है, जो निचले वर्गों की आवाज़ को बुलंद करने का लक्ष्य रखता है। दूसरी ओर, कई सार्वजनिक संस्थानों और एथिकल ग्रुपों ने इस टिप्पणी को असहज और अनुचित कहा। उन्होंने तर्क दिया कि न्यायपालिका को इस प्रकार की सार्वजनिक तुलना से बचना चाहिए, क्योंकि इसका प्रभाव जनता की न्यायिक संस्थाओं में भरोसे को हिला सकता है। इस पर एक बड़ी विरोध प्रदर्शन की भी योजना बनाई गई, जिसमें लोग न्यायिक स्वतंत्रता और समाज में सम्मान के मुद्दों को उठाते हुए, इस टिप्पणी के खिलाफ आवाज़ उठाते रहे। आख़िरकार, इस विवाद ने भारतीय राजनीति और न्यायिक अनुशासन के बीच सीमा रेखा को फिर से स्पष्ट किया। "कोकरोच जनता पार्टी" को आलोचक नकारात्मक रूप में देख रहे हैं, जबकि समर्थक इसे सामाजिक असमानताओं के खिलाफ एक नया आंदोलन मानते हैं। इस चर्चा से यह स्पष्ट हुआ कि भाषा, प्रतीक और सामाजिक संवेदनशीलता का मेल कितना नाज़ुक है, और इसके प्रभाव किस हद तक राष्ट्रीय विमर्श को आकार दे सकते हैं।