तमिलनाडु में सत्ता संघर्ष की मार धारा आगे तेज हो गई है। केंद्र सरकार की ओर से नियुक्त गवर्नर को लेकर कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) व कम्युनिस्ट पार्टी (भारत) के महासचिवों ने कड़ा आरोप लगाया है कि उन्होंने राज्य में लोकतांत्रिक प्रक्रिया को बाधित करने का प्रयत्न किया है। इस विवाद की पृष्ठभूमि में वर्तमान में गठित होने वाली सरकार का सवाल है, जहाँ एआईएडीएमके, डीएमके और बीजेपी के संभावित गठजोड़ की अटकलें चल रही हैं। दोनों कम्युनिस्ट पार्टियों ने अपने बयानों में कहा है कि गवर्नर ने अनुचित दबाव डाला है और संविधान के मूल सिद्धांतों का उल्लंघन किया है। उन्होंने कहा कि इस प्रकार की कार्रवाई से तमिलनाडु की लोकतांत्रिक गति में चोट पहुंचेगी और जनता के अधिकारों को नुकसान होगा। विवाद के मुख्य बिंदु यह हैं कि गवर्नर ने सरकार गठन में कुछ दलों को प्रतिकूल रूप से प्रभावित किया है, जिससे चुनावी परिणामों की वास्तविक इच्छा को बाधित किया जा रहा है। सीपीआई(M) के महासचिव ने खुलकर कहा कि गवर्नर ने विधेयक पारित करने में भी अनावश्यक विलंब किया है और इस कदम से सत्ता में आने वाले दलों की वैधता पर सवाल उठता है। सीपीआई के महासचिव ने भी समान चिंता व्यक्त की और आरोप लगाया कि गवर्नर के कार्यों से भ्रष्टाचार और राजनैतिक दवाब के बारे में चर्चा का माहौल बन रहा है, जो लोकतांत्रिक सिद्धांतों के खिलाफ है। इसी बीच तमिलनाडु में अन्य प्रमुख राजनीतिक दल भी इस विषय पर अपनी-अपनी राय व्यक्त कर रहे हैं। एआईएडीएमके और डीएमके के बीच संभावित समझौते की बातों पर चर्चा जारी है, जहाँ कुछ सूत्रों का मानना है कि बीजेपी के नजरे में भी इस गठबंधन की संभावना है। इस स्थिति में गवर्नर की भूमिका को लेकर सवाल उठते जा रहे हैं कि क्या वह निष्पक्ष मध्यस्थता कर रहे हैं या पक्षपाती रूप में सरकार गठन प्रक्रिया को प्रभावित कर रहे हैं। कई विश्लेषकों ने इस बात को रेखांकित किया है कि अगर गवर्नर का दबाव जारी रहा तो यह तमिलनाडु के राजनीतिक परिदृश्य को अस्थिर कर सकता है। आगे बढ़ते हुए तमिलनाडु में सरकार गठन की प्रक्रिया का परिणाम अभी स्पष्ट नहीं है, परंतु सीपीआई(M) व सीपीआई के महासचिवों द्वारा की गई कड़ी निंदा ने इस मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर भी उठाया है। जनता को निष्पक्ष और पारदर्शी प्रक्रिया का अधिकार है, और किसी भी शीर्षस्तरीय अधिकारी को इस अधिकार को सुनिश्चित करना चाहिए। इस कारण से अब तमिलनाडु के राजनैतिक मंच पर गवर्नर के कार्यों की पुनः समीक्षा की मांग पेश की गई है, जिससे लोकतांत्रिक सिद्धांतों की रक्षा हो सके। अंत में कहा जा सकता है कि तमिलनाडु की राजनीति इस क्षण में एक नाजुक मोड़ पर है, जहाँ सभी संबंधित पक्षों को संवैधानिक नियमों का सम्मान करते हुए समाधान निकालना आवश्यक है।